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कानून आम जनता के लिए, या शासन-प्रशासन के लिए भी? सफेद स्कूल वाहनों पर उठे सवाल, जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी डीएम और आरटीओ से व्हाट्सएप पर मांगा जवाब, लेकिन नहीं मिला कोई संतोषजनक उत्तर। अब सवाल क्या बच्चों की सुरक्षा से जुड़े नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?
चम्पावत।
स्कूल वाहनों की पहचान और बच्चों की सुरक्षा के लिए परिवहन विभाग ने स्पष्ट मानक तय किए हैं। स्कूल बस और वैन का रंग पीला रखने का उद्देश्य यही है कि वाहन दूर से दिखाई दे और सड़क पर अन्य चालक सतर्क हो जाएं। रंग परिवर्तन तक के लिए आरटीओ की पूर्व अनुमति और निर्धारित प्रक्रिया अनिवार्य है।
इसके बावजूद जनपद चम्पावत में विद्यार्थियों के परिवहन के लिए सफेद रंग के वाहनों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किए जाने की तस्वीरें सामने आने के बाद पूरे मामले ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस संबंध में जिला अधिकारी चम्पावत को व्हाट्सएप के माध्यम से जानकारी भेजकर उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया। साथ ही आरटीओ टनकपुर से भी संपर्क कर यह पूछा गया कि यदि स्कूल वाहनों के लिए पीला रंग निर्धारित है, तो सफेद वाहनों को किस नियम के तहत संचालित किया जा रहा है। लेकिन समाचार लिखे जाने तक किसी भी अधिकारी की ओर से कोई संतोषजनक जवाब प्राप्त नहीं हुआ।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एक आम वाहन स्वामी को अपने वाहन का रंग बदलने के लिए महीनों तक विभागीय प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है, तो सरकारी कार्यक्रमों में उन्हीं नियमों की अनदेखी क्यों दिखाई देती है?
क्या शासन और प्रशासन स्वयं उन्हीं नियमों का पालन कर रहा है, जिनका पालन करने की सीख वह जनता को देता है?
जनता पूछ रही है...
क्या इन वाहनों को स्कूल वाहन के रूप में विधिवत स्वीकृति प्राप्त है?
क्या परिवहन विभाग ने इनके रंग परिवर्तन की अनुमति दी है?
यदि नहीं, तो इन्हें हरी झंडी किस आधार पर दिखाई गई?
क्या बच्चों की सुरक्षा से जुड़े नियम सरकारी कार्यक्रमों में लागू नहीं होते?
क्या कानून सभी के लिए समान है या फिर व्यवस्था के अनुसार बदल जाता है?
बच्चों की सुरक्षा किसी भी सरकारी उपलब्धि से कहीं अधिक महत्वपूर्ण विषय है। यदि नियम बनाए गए हैं तो उनका पालन जनता, जनप्रतिनिधियों और शासन-प्रशासन—सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए। अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन और परिवहन विभाग के आधिकारिक स्पष्टीकरण पर टिकी हैं।
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