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सीमा पर प्यासा गांव: महाकाली के किनारे बसे लोग बूंद-बूंद को तरसे!
उत्तराखंड-नेपाल सीमा से सटा गांव आज भी मूलभूत सुविधा पानी के लिए जूझ रहा है। आजादी के 75 साल और राज्य गठन के दो दशक बाद भी हालात जस के तस हैं।
भारत-नेपाल को विभाजित करने वाली महाकाली नदी से महज 1000 मीटर की ऊंचाई पर बसे इस गांव के लोग आज भी पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं। विडंबना यह है कि जिस नदी का पानी पूरे क्षेत्र की जीवनरेखा है, उसी के किनारे बसे ग्रामीणों को पानी नसीब नहीं हो रहा।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि यहां पंपिंग लिफ्ट योजना लागू कर दी जाए, तो पूरे गांव की प्यास आसानी से बुझाई जा सकती है। लेकिन वर्षों से यह योजना फाइलों में ही दम तोड़ती नजर आ रही है।
गांव की पीड़ा:
महिलाएं रोजाना कई किलोमीटर दूर से पानी ढोने को मजबूर
गर्मियों में हालात और भयावह
कई बार जनप्रतिनिधियों से गुहार, लेकिन समाधान नहीं
बड़ा सवाल:
जब नदी पास है, तकनीक उपलब्ध है, तो फिर आखिर क्यों प्यासा है यह सीमा का गांव?
जनता की मांग:
जल्द से जल्द पंपिंग लिफ्ट योजना को स्वीकृति
सरकार और प्रशासन तत्काल संज्ञान ले
सीमा क्षेत्र के विकास को प्राथमिकता
चेतावनी भरी हकीकत:
सीमा पर बसे गांवों की उपेक्षा केवल विकास का सवाल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा मुद्दा बन सकता है।
निष्कर्ष:
महाकाली के किनारे बसी यह प्यास, अब केवल पानी की नहीं—सरकारी संवेदनशीलता की परीक्षा बन चुकी है।