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RTI में खुला विवेकाधीन कोष का खेल! सूचना दबाने के आरोप, गरीबों का हक बना सियासी हथियार बार-बार मांगने पर भी पूरी जानकारी नहीं सबका विकास पार्टी का आरोप रसूखदारों में बांटा गया सरकारी पैसा
चंपावत | विशेष संवाददाता
सरकारी पारदर्शिता पर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। सूचना का अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी को लेकर प्रशासन की भूमिका कटघरे में है।
ग्राम बैनगांव, जिला चंपावत निवासी डॉ. हरीश चन्द्र शर्मा ने 20 फरवरी 2026 को RTI के तहत मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से जुड़ी जानकारी मांगी थी। लेकिन आरोप है कि तय समय सीमा के बावजूद पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।
RTI में चुप्पी से बढ़ा शक आवेदक के अनुसार
20 फरवरी और 6 मार्च 2026 को लिखित रूप से जानकारी मांगी गई
लेकिन विभाग ने केवल आंशिक जानकारी दी
मुख्य बिंदु संख्या 01 और 02 अब तक अधूरे
यानी सबसे अहम जानकारी अब भी गायब है, जिससे पूरे मामले पर संदेह गहराता जा रहा है।
विवेकाधीन कोष बना विवाद का केंद्र
सबका विकास पार्टी
ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर सीधे आरोप लगाए हैं
गरीबों के नाम पर कोष का दुरुपयोग
राजनीतिक और आर्थिक रूप से मजबूत लोगों को फायदा
पारदर्शिता के नाम पर सिर्फ कागजी खानापूर्ति
पार्टी ने तंज कसते हुए कहा कि यह विवेकाधीन नहीं बल्कि विवेकहीन कोष बन चुका है।
सरकार और सिस्टम दोनों सवालों के घेरे में
सबसे बड़ा सवाल यह है कि
अगर सब कुछ नियमों के तहत हुआ, तो जानकारी देने में देरी क्यों?
RTI कानून के बावजूद सूचना न देना या टालना सीधे-सीधे पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है।
जनता का सवाल – किसके हिस्से गया पैसा?
स्थानीय लोगों में भी नाराजगी बढ़ रही है।
लोग पूछ रहे हैं कि
क्या वास्तव में जरूरतमंदों को लाभ मिला?
या फिर सरकारी धन रसूखदारों तक सीमित रह गया?
कड़ी कार्रवाई की मांग तेज
मामले को लेकर मांग उठ रही है कि
विवेकाधीन कोष की उच्चस्तरीय जांच हो
पूरी सूची सार्वजनिक की जाए
दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो
यह मामला अब सिर्फ एक RTI का नहीं, बल्कि सरकारी सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही की असली परीक्षा बन चुका है।
अगर समय रहते जवाब नहीं मिला, तो यह मुद्दा बड़ा सियासी तूफान खड़ा कर सकता है।
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