🔊
कोरोना लॉकडाउन में लापता पिता, सिस्टम की खामोशी और मां के आशीर्वाद से लड़ता बेटा उत्तराखंड की आवाज बना संदीप बिष्ट
अल्मोड़ा (उत्तराखंड)
यह खबर सिर्फ एक सोशल मीडिया चेहरे की नहीं है,
यह सवाल है—एक पिता कहां गुम हो गया और सिस्टम आज तक खामोश क्यों है?
अल्मोड़ा जनपद की सोमेश्वर घाटी स्थित मौवे गांव का रहने वाला संदीप बिष्ट आज सोशल मीडिया पर लाखों चेहरों पर मुस्कान बिखेर रहा है, लेकिन इस मुस्कान के पीछे एक ऐसा दर्द छुपा है, जिस पर न कभी जांच हुई, न जवाब मिला।
गुजरात से गांव लौटते वक्त गायब हुआ पिता
कोरोना काल से पहले संदीप के पिता गुजरात में नौकरी करते थे। लॉकडाउन लगते ही वे अपने गांव लौटने के लिए निकले, लेकिन वे घर कभी नहीं पहुंचे।
यह महज एक पारिवारिक त्रासदी नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता का सवाल भी है
क्या उनकी गुमशुदगी की गंभीर जांच हुई
क्या किसी विभाग ने जिम्मेदारी ली?
क्या प्रवासी मजदूरों की सूची में उनका नाम दर्ज हुआ
इन सवालों का जवाब आज भी अधर में है।
सिस्टम मौन रहा, परिवार अकेला लड़ता रहा
पिता के लापता होने के बाद संदीप का परिवार पूरी तरह टूट गया, लेकिन इस दर्द के बीच भी किसी विभाग, किसी तंत्र ने संवेदना से आगे बढ़कर जिम्मेदारी नहीं निभाई।
आज भी परिवार को सिर्फ एक ही जवाब मिलता है—पता नहीं।
मां का आशीर्वाद बना ढाल
ऐसे कठिन हालात में संदीप की मांईजा—ने बेटे को टूटने नहीं दिया।
मां का आशीर्वाद, त्याग और हिम्मत ही संदीप का संबल बना।
पिता के बिना भी मां के सहारे उसने खुद को संभाला और अपनी कला को हथियार बनाया।
हंसी के पीछे छुपा संघर्ष
संदीप का कंटेंट हल्का नहीं, बल्कि संघर्ष से निकला हुआ सच है।
वह अपने दर्द को चीख नहीं बनाता, बल्कि हंसी में ढालकर समाज तक पहुंचाता है। यही वजह है कि उसका साफ-सुथरा और जमीन से जुड़ा हास्य लोगों को सीधे छूता है।
KYAP Official की भूमिका
संदीप की प्रतिभा को पहचान और मंच देने में KYAP Official की भूमिका अहम रही है।
इस मंच ने न केवल अवसर दिया, बल्कि लगातार सहयोग कर इस लड़के को आगे बढ़ाया जो आज उत्तराखंड की लोकसंस्कृति का चेहरा बन रहा है।
उत्तराखंड की संस्कृति का सशक्त प्रतिनिधि
संदीप आज सिर्फ कंटेंट क्रिएटर नहीं, बल्कि
कुमाऊं की बोली, पहाड़ का दर्द और गांव की सादगी को देश-दुनिया तक पहुंचाने वाला चेहरा है।
पीएसआर उत्तर ध्वनि न्यूज़ का सवाल
पीएसआर उत्तर ध्वनि न्यूज़ प्रशासन और सरकार से सीधे सवाल करता है
कोरोना काल में लापता हुए प्रवासी मजदूरों की सूची कहां है?
संदीप के पिता की तलाश आज तक क्यों नहीं हुई?
क्या गरीब परिवारों के लिए न्याय सिर्फ फाइलों तक सीमित है?
संघर्ष से प्रेरणा
यह कहानी बताती है कि अगर सिस्टम साथ न दे, तब भी हौसला जिंदा रह सकता है।
पिता की अनुपस्थिति में भी संदीप आज उत्तराखंड की पहचान को मजबूत कर रहा है यह समाज के लिए प्रेरणा है और प्रशासन के लिए आईना।
पीएसआर उत्तर ध्वनि न्यूज़ ईश्वर से प्रार्थना करता है कि संदीप के पिता जहां भी हों, सुरक्षित हों और जल्द अपने परिवार के पास लौटें।