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अपनों ने ही खोली पोल अंकिता भंडारी हत्याकांड में नए खुलासों से सत्ता के गलियारों में हड़कंप
उत्तराखंड की बेटी अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने की लड़ाई एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है।
अब इस जघन्य हत्याकांड में भाजपा के पूर्व विधायक की पत्नी द्वारा किए गए LIVE खुलासों ने पूरे प्रदेश की राजनीति और प्रशासन को कठघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल सिर्फ़ एक हत्या का नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था, सत्ता की जवाबदेही और बेटियों की सुरक्षा का है।
जिस VIP का नाम लगातार सामने आ रहा है, उस पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई
क्या बेटी बचाओ का नारा सिर्फ़ मंचों और पोस्टरों तक सीमित है?
सबूतों पर बुलडोज़र, फिर भी चुप्पी क्यों?
यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि घटना के बाद यमकेश्वर की वर्तमान विधायिका द्वारा आधी रात को घटनास्थल पर बुलडोज़र चलवाया गया, जिससे अहम सबूत नष्ट होने की आशंका जताई गई।
इसके बावजूद अब तक IPC धारा 201 के तहत कोई कार्रवाई क्यों नहीं?
भारतीय दंड संहिता की धारा 201 साफ़ कहती है
> किसी अपराध के सबूतों को नष्ट करना या उनसे छेड़छाड़ करना स्वयं एक गंभीर अपराध है।
यदि मूल अपराध हत्या जैसा संगीन हो, तो
7 साल तक की सज़ा और जुर्माने का प्रावधान है।
यह क़ानून आम नागरिक और जनप्रतिनिधि — दोनों पर समान रूप से लागू होता है।
फिर सवाल वही:
सबूतों पर बुलडोज़र चलाने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
क्या कानून सिर्फ़ कमज़ोरों के लिए है?
क्या सत्ता में बैठे लोगों के लिए अलग न्याय व्यवस्था है?
अब मांग नहीं, चेतावनी है
अंकिता के माता-पिता और पूरा उत्तराखंड शुरू से ही CBI जांच की मांग करता आ रहा है। अब हालिया खुलासों के बाद यह मांग और भी मजबूत हो गई है।
हम मांग करते हैं कि:
इस हत्याकांड में सामने आ रहे हर नाम की निष्पक्ष जांच हो
सभी के बयान दर्ज किए जाएँ
सबूतों से छेड़छाड़ के मामलों में IPC 201 के तहत सख्त कार्रवाई हो
पद चाहे कितना भी बड़ा हो कानून से ऊपर कोई न हो
ये सिर्फ़ अंकिता की लड़ाई नहीं
यह लड़ाई हर उस बेटी की है, जो सुरक्षा और न्याय की उम्मीद लेकर इस समाज में जी रही है।
अगर आज हम चुप रहे, तो कल फिर कोई बेटी कुचली जाएगी।
न्याय चाहिए, नारे नहीं।
बेटी बचाओ सिर्फ़ पोस्टर पर नहीं, ज़मीन पर लागू करो।
जब दोषियों को सज़ा मिलेगी,
जब कानून सबके लिए बराबर होगा,
तभी कहा जा सकेगा हां, अब हमारी बेटियां सुरक्षित हैं।