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४०० वर्ष पुराना पवित्र पीपल चौतारी का पुनर्निर्माण : यात्री-धर्म और हिन्दू आस्था का अमूल्य धरोहर पुनः जीवित
देवलहाट क्षेत्र (नेपाल) लगभग 400 वर्ष प्राचीन, ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व रखने वाला पीपल चौतारी अब अपने पुराने वैभव के साथ फिर से जीवित होने जा रहा है। नेपाली सेना द्वारा संरक्षित एवं पुनर्निर्माण किए जा रहे इस पवित्र स्थल का कार्य अन्तिम चरण में पहुँच चुका है।
हिन्दू परंपरा में पीपल (अश्वत्थ) वृक्ष को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण यह चौतारी सदियों से देव-आवास, यात्रु-विश्राम और पुण्यस्थल के रूप में सम्मानित रहा है।
पुराने समय में जुम्ला, बाजुरा, अछाम, दैलेख, डोटी से होते हुए भारत के झूलाघाट, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा तक पैदल यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए यह चौतारी मुख्य पड़ाव हुआ करता था। कठिन यात्राओं के दौरान यात्री यहाँ रुककर भोजन पकाते थे, विश्राम करते थे और भगवान का स्मरण करते हुए आगे बढ़ते थे।
स्थानीय निवासियों के अनुसार यह चौतारी केवल एक विश्रामस्थल नहीं, बल्कि हिन्दू समाज की अतिथि–धर्म परंपरा, दान–धर्म, सद्भाव और सामाजिक समरसता का जीवंत प्रतीक था।
पुनर्निर्माण में जुटे नेपाली सेना के अधिकारियों ने बताया कि इस स्थान की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक गरिमा को सुरक्षित रखते हुए संरचना को और मजबूत एवं आकर्षक रूप में विकसित किया जा रहा है।
स्थानीय धार्मिक अगुवों का कहना है
पीपल चौतारी का पुनर्जागरण दरअसल हमारे पूर्वजों की परंपराओं और धरोहरों को पुनः उजागर करना है। यह स्थान आज की पीढ़ी के लिए हिन्दू सभ्यता और यात्रु संस्कृति को समझने की एक जीवित पाठशाला है।
पुनर्निर्माण पूरा होने के बाद इस पवित्र स्थल को धार्मिक मिलन केंद्र, यात्रियों के विश्राम स्थल और सांस्कृतिक धरोहर स्थल के रूप में विकसित किए जाने की अपेक्षा है।
यह पुनर्निर्माण न केवल सदियों पुरानी हिन्दू आस्था और यात्रु संस्कृति को नया जीवन दे रहा है, बल्कि आने वाले समय में इस क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन की अपार संभावनाएँ भी उजागर करता है।