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ग्राम पंचायत सुल्ला में गोरा की धूम मची लोकधर्म और आस्था का अद्भुत संगम जयकारों से गूंजा सुल्ला गांव, महिलाओं ने गीतों और पारंपरिक नृत्य से सजाई गौरा महोत्सव की शाम, शिव गौरा विवाह की झलक ने बांधा समां
चंपावत, लोहाघाट। ग्राम पंचायत सुल्ला में गोरा पर्व (गौरा सातों–आठों) का आयोजन पूरे हर्षोल्लास और भक्ति भाव से संपन्न हुआ। इस दौरान ग्रामीण महिलाएँ पारंपरिक वेशभूषा में एकत्र हुईं और भजन-कीर्तन, पूजा-अर्चना एवं लोकनृत्य में सहभागिता निभाई। पूरे गांव में “जय मां गोरा” के जयकारे गूंजते रहे।
ग्राम पंचायत सुल्ला के प्रधान त्रिलोक सिंह की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम में पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने विशेष योगदान दिया। पूर्व प्रधान प्रतिनिधि त्रिलोक सिंह और वरिष्ठ सदस्य दयाल सिंह भी मौजूद रहे।
गोरा पर्व का इतिहास और महत्त्व
कुमाऊँ अंचल में मनाया जाने वाला यह पर्व भगवान शिव और पार्वती (गौरा) के विवाह से जुड़ा है। मान्यता है कि गौरा ने शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया। इसीलिए इस पर्व को स्त्रियों का विशेष पर्व माना जाता है।
यह पर्व भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की सप्तमी से अष्टमी तक मनाया जाता है। इसी कारण इसे सातों आठों भी कहा जाता है।
पंचमी को पाँच अनाज (बीज) बोए जाते हैं।
षष्ठी को महिलाएँ गीत गाती हुई इन बीजों को नदी से लाकर पूजन करती हैं।
सप्तमी को गौरा की प्रतिमा बनाई जाती है और महिलाएँ व्रत रखती हैं।
अष्टमी को गौरा और शिव के प्रतीकात्मक विवाह का आयोजन किया जाता है। महिलाएँ पारंपरिक नृत्य देउड़ा करती हैं और आयोजन का समापन मूर्ति विसर्जन के साथ होता है।
सांस्कृतिक झलक
ग्राम पंचायत सुल्ला में हुए आयोजन में महिलाओं ने कुमाऊँनी लोकगीत गाकर वातावरण को भक्तिमय बना दिया। गौरा–शिव विवाह की झांकी ने पूरे गांव को लोकधर्म और परंपरा से जोड़ दिया।
फोटो
सुल्ला में गौरा महोत्सव के दौरान पूजा-अर्चना करते ग्रामवासी
आयोजन समिति के सदस्य – ग्राम पंचायत सुल्ला
रतन सिंह
दान सिंह
पुरन सिंह
प्रीतम सिंह
नारायण राम
शंकर राम
संतोष राम
लक्ष्मण सिंह
हयात सिंह
हर सिंह
हरीश राम
पूर्व प्रधान प्रतिनिधि : त्रिलोक सिंह
वरिष्ठ सदस्य दयाल सिंह