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किंगमेकर की राजनीति या जनता से समझौता? UKD के इतिहास पर फिर उठे बड़े सवाल
देहरादून।
उत्तराखंड की राजनीति में कभी सत्ता की चाबी अपने हाथ में रखने वाला उत्तराखंड क्रांति दल आज अपने ही अतीत के सवालों से घिरा हुआ है।
2002: 4 सीटें और कांग्रेस को समर्थन
राज्य गठन के बाद 2002 में UKD ने 4 सीटों पर जीत दर्ज की और सत्ता संतुलन में अहम भूमिका निभाई।
प्रमुख विजयी विधायक (उपलब्ध रिकॉर्ड अनुसार):
दिवाकर भट्ट द्वाराहाट
नारायण सिंह जंतवाल (क्षेत्रीय सीट)
काशी सिंह ऐरी डीडीहाट
पुष्पेश त्रिपाठी (द्वाराहाट क्षेत्र से जुड़ा प्रभाव)
इसके बाद UKD ने कांग्रेस को समर्थन दिया और
नारायण दत्त तिवारी की सरकार बनी।
2007: 3 सीटें और BJP को समर्थन
2007 में UKD ने 3 सीटें जीतीं और फिर सत्ता की चाबी अपने पास रखी।
प्रमुख विधायक:
दिवाकर भट्ट द्वाराहाट
पुष्पेश त्रिपाठी द्वाराहाट
काशी सिंह ऐरी डीडीहाट
इस बार UKD ने समर्थन दिया
भारतीय जनता पार्टी को
और सरकार बनी
भुवन चंद्र खंडूरी के नेतृत्व में।
अब जनता के तीखे सवाल
जब 2002 और 2007 दोनों पंचवर्षीय कार्यकाल में UKD किंगमेकर रही, तो
उत्तराखंड के लिए कौन सा बड़ा ऐतिहासिक फैसला करवाया?
पहाड़ों से पलायन रोकने के लिए क्या ठोस नीति बनी?
बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य इन मुद्दों पर क्या उपलब्धि रही?
क्या UKD सिर्फ सत्ता के समीकरण बनाने तक सीमित रही?
क्या समर्थन विचारधारा पर था या सत्ता में हिस्सेदारीपर?
यही वजह बनी गिरावट की?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है
बार-बार समर्थन बदलना
स्पष्ट एजेंडा न दिखना
अंदरूनी गुटबाजी
इन कारणों से जनता का भरोसा कमजोर होता चला गया।
अब आशीष नेगी की परीक्षा
इसी बीच UKD के नेता आशीष नेगी संवाद यात्रा के जरिए जनता के बीच पहुंच रहे हैं।
लेकिन अब सवाल सिर्फ संवाद का नहीं,
जवाब देने का है।
सबसे बड़ा सवाल (भविष्य पर)
अगर आने वाले चुनाव में UKD पूर्ण बहुमत में नहीं आती,
तो क्या फिर वही समर्थन की राजनीति दोहराई जाएगी?
क्या UKD इस बार स्पष्ट करेगी कि वह किसी भी दल को समर्थन देगी या नहीं?
निष्कर्ष
उत्तराखंड की जनता अब हिसाब मांग रही है
किंगमेकर बनकर क्या मिला राज्य को?
और भविष्य में UKD किस दिशा में जाएगी?