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418 साल से बराबरी का संदेश देता बनारसी धाम आज भी उपेक्षित दलित पुजारी परंपरा वाला मंदिर विकास को तरसा, सरकार पर उठे बड़े सवाल
देहरादून विशेष। नेपाल। पाटन बैतडी नगरपालिका 3 गुजर में स्थित ऐतिहासिक बनारसी धाम विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर सदियों से सामाजिक समानता और धार्मिक समरसता की मिसाल पेश करता आ रहा है, लेकिन विडंबना यह है कि इतना महत्वपूर्ण धाम आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है।
421 साल पुरानी परंपरा: बिना भेदभाव के पूजा
वि.सं. 1664 में शुरू हुई परंपरा के अनुसार इस धाम में सभी जातियों को समान रूप से पूजा-अर्चना का अधिकार दिया गया।
आज भी यहां दलित और सवर्ण समुदाय मिलकर पूजा करते हैं, जो सामाजिक एकता का दुर्लभ उदाहरण है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार यह धाम भगवान शिव के विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग से जुड़ा हुआ है और प्राचीन ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। यहां कुम्भ मेला, कोटीहोम, सावन मेला जैसे बड़े धार्मिक आयोजन होते हैं, जिनमें नेपाल और भारत से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
दलित मुख्य पुजारी परंपरा: पहचान भी, संदेश भी
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां परंपरागत रूप से दलित समुदाय के मुख्य पुजारी होते हैं, जबकि सभी जातियों के लोग मिलकर पूजा-अर्चना करते हैं।
यह परंपरा सदियों से सामाजिक बराबरी और भाईचारे का संदेश देती आ रही है।
विकास से दूर: सड़क, पुल और सुविधाओं का अभाव
इतनी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता के बावजूद मंदिर तक पहुंचना आज भी आसान नहीं है।
रास्ते जर्जर हैं, नदी पर पुल नहीं है और बुनियादी सुविधाओं का अभाव साफ नजर आता है।
जहां कुछ ही मिनटों में पहुंचा जा सकता है, वहां श्रद्धालुओं को घंटों पैदल चलना पड़ता है।
18 करोड़ की योजना सिर्फ 12 लाख की मदद उपेक्षा का बड़ा उदाहरण
मंदिर के विकास के लिए 18 करोड़ 80 लाख रुपये की विस्तृत योजना तैयार की गई, लेकिन अब तक केवल 12 लाख रुपये की सहायता ही मिल पाई है।
यह आंकड़ा खुद बताता है कि इस ऐतिहासिक धाम को किस स्तर पर नजरअंदाज किया गया है।
पुजारियों और समिति की दो टूक मांग
मंदिर से जुड़े पुजारियों और प्रबंधन समिति ने सरकार से स्पष्ट मांग की है
मंदिर तक सड़क और पुल का निर्माण
धर्मशाला, शौचालय और अन्य सुविधाओं की व्यवस्था
धाम को पर्यटन मानचित्र में प्रमुख स्थान
समिति का कहना है कि यह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और एकता का प्रतीक है, जिसे संरक्षित करना जरूरी है।
फ्रंटलाइन सवाल
421 साल पुरानी विरासत आखिर कब तक उपेक्षित रहेगी?
दलित पुजारी परंपरा वाले इस अनोखे धाम को क्यों नहीं मिल रहा सम्मान?
क्या सरकार सिर्फ वादों तक सीमित रह जाएगी?
निष्कर्ष:
जो धाम सदियों से समाज को बराबरी और भाईचारे का संदेश दे रहा है, वही आज खुद उपेक्षा का शिकार है अब जवाबदेही तय होना जरूरी है।